Wednesday, December 18, 2013

मुंदती हुयी आँखों के चारो ओर सिमटती हुयी दुनिया



मुंदती हुयी आँखों के चारो ओर
सिमटती हुयी दुनिया
और बुझता हुया
जिन्दगी का चिराग !
कह देना सितारों से
आकर ले जाएँ ,
कुछ अनकहे से शब्द सन्देश,
मेरे उन सब अपनों के लिए ,
जिनकी आशाओ का केंद्र था मै,
शहादत से पहले तक !
सरहद थी सामने ,
निगाहों में जुनून था,
और माँ भारती से किया
वह वादा भी ,
जिसे पूरा करते करते ,
कुछ वादे अधूरे छोड़े जा रहा हूँ ...
मुन्नू की सायकिल का ,
बाबू की आँखों के इलाज का ,
अम्मा की मन्नत पूरी करवाने का ,
और तुझसे किया वादा भी ....
फिर मिलने का ....!
आयेंगे मेरी शहादत पर
अपनी रोटी सेंकने
कुछ सियासतदान ,कुछ हुक्मरान ,
कह देना उनसे ,
मै कायर नहीं था
उन सबकी तरह ,
जो कर सकता था कर गया !
आंसू मत बहाना मेरी खातिर ,
अंगारे पैदा करना
उन आसूंओं के एवज में ,
और देना सीख
अपने मुन्नू को ,
मै तो लड़ मरा सरहद पर,
दुश्मनों से ,
उसे लड़ना है घर के अंदर
छुपे उन शैतानो से,
जिन्होंने दलाली खायी ,
सैन्य सामानों की खरीद में,
और मैंने खाई गोली ,
उनकी दलाली के एवज में,
मेरी शहादत तभी सफल होगी ,
जब उखड जायेगा तम्बू देश के दलालों का !
मुंदती हुयी आँखों के चारो ओर
सिमटती हुयी दुनिया
और बुझता हुया
जिन्दगी का चिराग !
कह देना सितारों से
आकर ले जाएँ ,
कुछ अनकहे से शब्द सन्देश,
मेरे उन सब अपनों के लिए ,
जिनकी आशाओ का केंद्र था मै,
शहादत से पहले तक !!
रंजन कुमार 23-08-2013.

जिन्दगी से रूठकर सावन गया

मुझको तेरी चाह ने ,ला दिया इस मोड़ पर ,
लगने लगा,जिन्दगी से रूठकर सावन गया !
रंजन कुमार 25-08-13

कुछ प्यार के वादे अब भी हैं

यादों की चादर ओढ़े जब ,
तेरी गली से मेरा गुजर हुआ ,
महसूस हुआ इन राहों में ,
चाहत की खुशबू अब भी है !
मै जान गया ऐ नूर ए नजर ,
कुछ प्यार के वादे अब भी हैं !!
रंजन कुमार 25-08-13

अस्तित्व नहीं कुछ भी ,

अस्तित्व नहीं कुछ भी ,
बहारों का,नजारों का,
इन फूलों पत्थरों और 
पहाड़ों का !
अगर तुम नहीं शामिल,
इन बहारों में ,
नजारों में,
और इस जिन्दगी के,
किनारों में !!
रंजन कुमार 29-08-13.

अब इस शहर की हवा में पहले जैसी कहीं वो बात कहाँ

अब इस शहर की हवा में पहले जैसी कहीं वो बात कहाँ ?
बातें करते थे परिंदे भी कभी हमसे अब वो जज्बात कहाँ ?

एक सन्नाटा है हर तरफ बिखरा हुआ अब कहीं शोर नहीं,
दरीचे पूछते हैं मुझसे आधी अधूरी होनेवाली मुलाकात कहाँ?

उठाई थी उंगली कभी जिसने हमारी पाक मोहब्बत पर भी,
ढूंढता हूँ उसको मै अब गली गली गयी वह बदजात कहाँ !

तंज ही तंज कसे जाते थे जिस तरफ भी निकल पड़ते थे,
कोई कुछ नहीं कहता अब गयी उन सबकी फ़ौज कहाँ ?

अब तो चाची भी देखती है जाने कैसे आँखे मीच मीच कर ,
उसके मन में जो बने थे हमारे लिए गए वे ख्यालात कहाँ ?

एक तुम क्या बिछड़े बदल गयी पूरी की पूरी दुनिया सारी ,
तो अदावत सबकी थी बस मोहब्बत से अब कोई बात कहाँ ?
रंजन कुमार 05-09-2013.

कभी न घबराना तुम गम के जंगल में , आएगा दिन गर रात है आई



कभी न घबराना तुम गम के जंगल में ,
आएगा दिन गर रात है आई ,
विश्वाश तू करना खुद पर रब से भी ज्यादा ,
फिर होगी सुबह गर शाम है आई !

सपने देखो ऐसे जो तुम्हे आबाद करे ,
इस जीवन में हर बंधन से आजाद करे !
लब पर अपने फरियाद न तुम आने देना,
चाहे दुःख की घनी बदली हो छाई !!
विश्वाश तू करना खुद पर रब से भी ज्यादा ,
फिर होगी सुबह गर शाम है आई !

क्या ऐतबार मेरे प्यार का तुम कर सकती हो ,
गर राहों में कांटे भी मिले चल सकती हो ?
तो आओ रख दो हाथ मेरे इन हाथो में ,
देखो कैसी बहार बसन्ती पवन है लाई !
विश्वाश तू करना खुद पर रब से भी ज्यादा ,
फिर होगी सुबह गर शाम है आई !

जीवन में खुशियाँ अपने आप नहीं मिलती,
सागर से सीप की तरह ही ढूंढ़नी है पड़ती !
कभी न रखना किसी से कुछ भी उम्मीदें ,
कुछ मिल जाये तो उसमे खुशियाँ बहुत समायी !!
विश्वाश तू करना खुद पर रब से भी ज्यादा ,
फिर होगी सुबह गर शाम है आई !


कभी न घबराना तुम गम के जंगल में ,
आएगा दिन गर रात है आई !
विश्वाश तू करना खुद पर रब से भी ज्यादा ,
फिर होगी सुबह गर शाम है आई !!
रंजन कुमार 21-08-2013

ये आंधियाँ बुझा न दें जलाये थे हमने चिराग कुछ

ये आंधियाँ बुझा न दें जलाये थे हमने चिराग कुछ !
अगली सुबह के आने तक रखना संभाल कर इन्हें !!
रंजन कुमार 22-09-13